सांगटी" एक नर्क भरी दास्ताँ !
- January 28, 2020
सीलन भरे कमरे, टीप टीप बरसता पानी, जहां धूप की रोशनी तो मानो एक अद्वितीय कल्पना की तरह है जिसका इस युग में पहुंच पाना तो हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का एक सपना ही रह जायेगा । जी हां बात "हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय" के साथ सटे गांव "सांगटी" की है जिसे गांव कहें शहर कहें या जाड़ा कहें यह कह पाना मुश्किल है क्यूंकि साल के 12 महिनों में यहां एक ही ऋतु पायी जाती है जिसे "शीत ऋतु" के नाम से जाना जाता है । नि:सन्देह अगर इस गांव को हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का "दिल" कहें तो यह उपाधि देना भी गलत नहीं होगा। 1970 से विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद से ही यह गांव इस विश्वविद्यालय में पढ़ रहे सबसे प्रखर और बुद्धिजीवी छात्रों का एक अस्थायी घर और अड्डा माना जाता है जो खास तौर पर 2012-13 के बाद चर्चा में आया जब विश्वविद्यालय के छात्रावासों से निकाले गये छात्रों का पलायन इस छोटे से गांव में हुआ जहां एक छोटे से कमरे का किराया मात्र 500 से 1000 रुपये हुआ करता था। कितने ही प्रोफेसर, प्रशासनिक अधिकारी, नेेेेता और न जाने देश-प्रदेश का ऐसा कौन सा क्षेत्र या व्यवसाय होगा जहां इस गांव में रहकर विश्वविद्यालय के दिनों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों ने सफलता की उंचाईयां नहीं छुई होंगी ।
आखिर "सांगटी" क्यूँ है खास ?
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में कुल 15 हॉस्टल हैं जिसमें 4 बॉयस और 11 गर्लस हॉस्टल हैं जिसमें लगभग 1800 विद्यार्थी रहते हैं । विश्वविद्यालय में हर साल लगभग 3 से 4 हज़ार विद्यार्थी विभिन्न विभागों में प्रवेश लेते हैं जिसका सीधा सा मतलब यह है की 50 से 60% विद्यार्थियों को हॉस्टल की सुविधा नहीं मिलती है और उन्हें विश्वविद्यालय परिसर के आसपास किराये का कमरा लेकर रहना और पढ़ना पड़ता है । इसलिये विश्वविद्यालय के जो "आवासीय छात्र" हैं जिन्हें "डे सकॉलर" भी कहा जाता है का एक बड़ा प्रतिशत हिस्सा इसी गांव में रहता है जो विश्वविद्यालय परिसर के सबसे नजदीक है ।
मजबुरी और मनमानी :
छात्रों की बढ़ती तादात और हॉस्टल न मिलने की मजबुरी के कारण इस गांव में पिछ्ले 5-6 सालों में लगातार नई इमारतों और कमरों का निर्माण हो रहा है जिसमें बहुत से छात्र रहते हैं । कमरों की माँग इतनी बढ़ गयी है कि यहां की जमीन के मालिकों ने 5 से 6 मंज़िला मकान खड़ा कर दिया है। जंगल के बीच होने के कारण यहां सूरज की रौशनी भी मुश्किल से नसीब होती है लेकिन मजबुरी के चलते छात्रों को यहां कमरे लेने ही पड़ते हैं । इसी मजबुरी का फायदा उठाकर यहां के मकान मालिक चंडीगढ़ और दिल्ली जैसे शहरों की तर्ज पर मनचाहा किराया वसूल कर रहे हैं । महंगी शिक्षा और शिमला की महंगाई के चलते कई छात्र जिनको हॉस्टल नहीं मिल पाता वह अपने घर की आर्थिक स्थिति के मारे प्रवेश परीक्षा पास करने के बाद भी प्रवेश नहीं ले पाते और मजबूरन उन्हें पढ़ाई छोड़ना पड़ती है । विडम्बना तो यह है कि यह इलाका एक गांव है जो "शिमला नगर निगम" के बजाय "शिमला ग्रमीण" के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत आता है जिससे मकान मालिक खुब चांदी लुट रहे हैं क्यूंकि मकान का टैक्स जो नहीं चुकाना पड़ता । ग्रमीण क्षेत्र होने का कारण यहां के मकान मालिक राजाओं के समान जिंदगी जी रहे हैं । मजबुरी की नस पकड़ कर माननीय मालिक लोग एक छोटे से सीलन भरे कमरे का 4 से 5 हज़ार किराया वसूल रहे हैं जहां ना ढंग से पानी की व्यव्स्था है, ना बिजली की व्यव्स्था है और ना जहां धूप के दीदार होते हैं । यहां सबसे मजेदार तो कमरों की दिवारें, फर्श और सबकी बेस्ट फ्रेंड सीलन और ठंड होती है जिसका दुख और दर्द सिर्फ वही लोग समझते हैं जो बेचारे पिछ्ले कई सालों से मजबुरी के मारे यहां रह रहे हैैं। नमी और सूरज की रोशनी न पहुंचने के कारण यहां बारह महीने ठंड ही पायी जाती है ।
विश्वविद्यालय स्थापना का उद्देश्य ?
200 एकड़ में फैले हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की स्थापना जब 22 जुलाई 1970 को की गयी थी तो इसका मात्र उद्देश्य न केवल प्रदेश के गरीब लोगों, पिछड़े वर्ग के छात्रों को शिक्षा प्रदान कराना था बल्कि एक पहाड़ी, ग्रमीण और कृषक राज्य होने के चलते शिक्षा के मौलिक अधिकार को गरीब से गरीब वर्ग के छात्रों को पहुंचाना भी था जिससे की प्रदेश के होनहार और मेहनती छात्र खुद की काबिलियत का इस्तेमाल देश की उन्नति के लिये कर सकें । विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले अधिकतर छात्र प्रदेश के ग्रमीण और गरीब परिवार से आते हैं । 21वीं सदी में जहां लगातार "शिक्षा के निजीकरण और व्यापारीकरण" से शिक्षा महंगी हो रही है उससे उच्च शिक्षा ग्रहण करना लगभग एक चुनौती बन गया है ।
आगे क्या किया जा सकता है ?
विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले सभी छात्रों को इस विषय में अपनी आवाज़ उंची करनी पड़ेगी खासकर जो हॉस्टल की सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं और विश्वविद्यालय प्रशासन से लेकर सभी छात्र संगठनों को छात्रों के आर्थिक अधिकारों के रक्षा हेतु इसके लिये आगे आना चाहिये । समस्या सबके सामने है क्यूंकि यह समस्या न केवल "सांगटी गांव" की है बल्कि विश्वविद्यालय परिसर के आसपस के सभी इलाकों की है जहां गरीब छात्रों की मजबुरी का फायदा उठा कर मकान मलिक मनचाहा किराया वसूल रहे हैं । जिन कमरों का कोई एक हज़ार भी देना पसंद ना करे उसका हर महीने 4 से 5 हज़ार देना पड़ रहा है और 2 कमरों के किराये का तो क्या ही कहना उनके दाम तो ऊँचाइयाँ छू रहे हैं जो 7 से 12 हज़ार के बीच में मिल रहे हैं । सुविधायें कम और किराये का अनुपात इतना ज्यादा है कि इंसानियत भी खुद से शरमा जाये । प्रदेश सरकार और माननीय उच्च न्यायालय को भी इस समक्ष स्वतः संज्ञान लेना चाहिये और "हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय परिसर" के समीप के इलाकों के मकानों का औचक निरीक्षण करना चाहिये और मकान और कमरे की हालत को देखकर किराये के अनुपात को निर्धारित करना चाहिये । छात्रों का आर्थिक शोषण ना हो इसके लिये विश्वविद्यालय प्रशासन को भी इसके संदर्भ में एक समिति का गठन करना चाहिये जो विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले प्रत्येक छात्र की समस्या को समझ कर उसका समाधान निकाल सके और विश्वविद्यालय परिसर के आसपास के इलाकों के मकान मालिकों को मकान की हालत और सुविधाओं के अनुरुप किराया वसूलने का दिशा निर्देश दे सकें । हर साल विश्वविद्यालय से हज़ारों छात्र पढ़कर निकलते हैं जो प्रदेश की राजनीतिक, प्रशासनिक सेवाओं से लेकर उच्च न्यायालय में अपनी कानूनी सेवायें दे रहे हैं लेकिन इस मुलभुत समस्या का कोई भी स्वतः संज्ञान नहीं ले रहा यह एक चिंता का विषय है ।
"मनमानी भी ना हो और किसी को हानि भी ना हो"।
- January 28, 2020
सीलन भरे कमरे, टीप टीप बरसता पानी, जहां धूप की रोशनी तो मानो एक अद्वितीय कल्पना की तरह है जिसका इस युग में पहुंच पाना तो हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का एक सपना ही रह जायेगा । जी हां बात "हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय" के साथ सटे गांव "सांगटी" की है जिसे गांव कहें शहर कहें या जाड़ा कहें यह कह पाना मुश्किल है क्यूंकि साल के 12 महिनों में यहां एक ही ऋतु पायी जाती है जिसे "शीत ऋतु" के नाम से जाना जाता है । नि:सन्देह अगर इस गांव को हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का "दिल" कहें तो यह उपाधि देना भी गलत नहीं होगा। 1970 से विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद से ही यह गांव इस विश्वविद्यालय में पढ़ रहे सबसे प्रखर और बुद्धिजीवी छात्रों का एक अस्थायी घर और अड्डा माना जाता है जो खास तौर पर 2012-13 के बाद चर्चा में आया जब विश्वविद्यालय के छात्रावासों से निकाले गये छात्रों का पलायन इस छोटे से गांव में हुआ जहां एक छोटे से कमरे का किराया मात्र 500 से 1000 रुपये हुआ करता था। कितने ही प्रोफेसर, प्रशासनिक अधिकारी, नेेेेता और न जाने देश-प्रदेश का ऐसा कौन सा क्षेत्र या व्यवसाय होगा जहां इस गांव में रहकर विश्वविद्यालय के दिनों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों ने सफलता की उंचाईयां नहीं छुई होंगी ।
आखिर "सांगटी" क्यूँ है खास ?
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में कुल 15 हॉस्टल हैं जिसमें 4 बॉयस और 11 गर्लस हॉस्टल हैं जिसमें लगभग 1800 विद्यार्थी रहते हैं । विश्वविद्यालय में हर साल लगभग 3 से 4 हज़ार विद्यार्थी विभिन्न विभागों में प्रवेश लेते हैं जिसका सीधा सा मतलब यह है की 50 से 60% विद्यार्थियों को हॉस्टल की सुविधा नहीं मिलती है और उन्हें विश्वविद्यालय परिसर के आसपास किराये का कमरा लेकर रहना और पढ़ना पड़ता है । इसलिये विश्वविद्यालय के जो "आवासीय छात्र" हैं जिन्हें "डे सकॉलर" भी कहा जाता है का एक बड़ा प्रतिशत हिस्सा इसी गांव में रहता है जो विश्वविद्यालय परिसर के सबसे नजदीक है ।
मजबुरी और मनमानी :
छात्रों की बढ़ती तादात और हॉस्टल न मिलने की मजबुरी के कारण इस गांव में पिछ्ले 5-6 सालों में लगातार नई इमारतों और कमरों का निर्माण हो रहा है जिसमें बहुत से छात्र रहते हैं । कमरों की माँग इतनी बढ़ गयी है कि यहां की जमीन के मालिकों ने 5 से 6 मंज़िला मकान खड़ा कर दिया है। जंगल के बीच होने के कारण यहां सूरज की रौशनी भी मुश्किल से नसीब होती है लेकिन मजबुरी के चलते छात्रों को यहां कमरे लेने ही पड़ते हैं । इसी मजबुरी का फायदा उठाकर यहां के मकान मालिक चंडीगढ़ और दिल्ली जैसे शहरों की तर्ज पर मनचाहा किराया वसूल कर रहे हैं । महंगी शिक्षा और शिमला की महंगाई के चलते कई छात्र जिनको हॉस्टल नहीं मिल पाता वह अपने घर की आर्थिक स्थिति के मारे प्रवेश परीक्षा पास करने के बाद भी प्रवेश नहीं ले पाते और मजबूरन उन्हें पढ़ाई छोड़ना पड़ती है । विडम्बना तो यह है कि यह इलाका एक गांव है जो "शिमला नगर निगम" के बजाय "शिमला ग्रमीण" के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत आता है जिससे मकान मालिक खुब चांदी लुट रहे हैं क्यूंकि मकान का टैक्स जो नहीं चुकाना पड़ता । ग्रमीण क्षेत्र होने का कारण यहां के मकान मालिक राजाओं के समान जिंदगी जी रहे हैं । मजबुरी की नस पकड़ कर माननीय मालिक लोग एक छोटे से सीलन भरे कमरे का 4 से 5 हज़ार किराया वसूल रहे हैं जहां ना ढंग से पानी की व्यव्स्था है, ना बिजली की व्यव्स्था है और ना जहां धूप के दीदार होते हैं । यहां सबसे मजेदार तो कमरों की दिवारें, फर्श और सबकी बेस्ट फ्रेंड सीलन और ठंड होती है जिसका दुख और दर्द सिर्फ वही लोग समझते हैं जो बेचारे पिछ्ले कई सालों से मजबुरी के मारे यहां रह रहे हैैं। नमी और सूरज की रोशनी न पहुंचने के कारण यहां बारह महीने ठंड ही पायी जाती है ।
विश्वविद्यालय स्थापना का उद्देश्य ?
200 एकड़ में फैले हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की स्थापना जब 22 जुलाई 1970 को की गयी थी तो इसका मात्र उद्देश्य न केवल प्रदेश के गरीब लोगों, पिछड़े वर्ग के छात्रों को शिक्षा प्रदान कराना था बल्कि एक पहाड़ी, ग्रमीण और कृषक राज्य होने के चलते शिक्षा के मौलिक अधिकार को गरीब से गरीब वर्ग के छात्रों को पहुंचाना भी था जिससे की प्रदेश के होनहार और मेहनती छात्र खुद की काबिलियत का इस्तेमाल देश की उन्नति के लिये कर सकें । विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले अधिकतर छात्र प्रदेश के ग्रमीण और गरीब परिवार से आते हैं । 21वीं सदी में जहां लगातार "शिक्षा के निजीकरण और व्यापारीकरण" से शिक्षा महंगी हो रही है उससे उच्च शिक्षा ग्रहण करना लगभग एक चुनौती बन गया है ।
आगे क्या किया जा सकता है ?
विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले सभी छात्रों को इस विषय में अपनी आवाज़ उंची करनी पड़ेगी खासकर जो हॉस्टल की सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं और विश्वविद्यालय प्रशासन से लेकर सभी छात्र संगठनों को छात्रों के आर्थिक अधिकारों के रक्षा हेतु इसके लिये आगे आना चाहिये । समस्या सबके सामने है क्यूंकि यह समस्या न केवल "सांगटी गांव" की है बल्कि विश्वविद्यालय परिसर के आसपस के सभी इलाकों की है जहां गरीब छात्रों की मजबुरी का फायदा उठा कर मकान मलिक मनचाहा किराया वसूल रहे हैं । जिन कमरों का कोई एक हज़ार भी देना पसंद ना करे उसका हर महीने 4 से 5 हज़ार देना पड़ रहा है और 2 कमरों के किराये का तो क्या ही कहना उनके दाम तो ऊँचाइयाँ छू रहे हैं जो 7 से 12 हज़ार के बीच में मिल रहे हैं । सुविधायें कम और किराये का अनुपात इतना ज्यादा है कि इंसानियत भी खुद से शरमा जाये । प्रदेश सरकार और माननीय उच्च न्यायालय को भी इस समक्ष स्वतः संज्ञान लेना चाहिये और "हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय परिसर" के समीप के इलाकों के मकानों का औचक निरीक्षण करना चाहिये और मकान और कमरे की हालत को देखकर किराये के अनुपात को निर्धारित करना चाहिये । छात्रों का आर्थिक शोषण ना हो इसके लिये विश्वविद्यालय प्रशासन को भी इसके संदर्भ में एक समिति का गठन करना चाहिये जो विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले प्रत्येक छात्र की समस्या को समझ कर उसका समाधान निकाल सके और विश्वविद्यालय परिसर के आसपास के इलाकों के मकान मालिकों को मकान की हालत और सुविधाओं के अनुरुप किराया वसूलने का दिशा निर्देश दे सकें । हर साल विश्वविद्यालय से हज़ारों छात्र पढ़कर निकलते हैं जो प्रदेश की राजनीतिक, प्रशासनिक सेवाओं से लेकर उच्च न्यायालय में अपनी कानूनी सेवायें दे रहे हैं लेकिन इस मुलभुत समस्या का कोई भी स्वतः संज्ञान नहीं ले रहा यह एक चिंता का विषय है ।
"मनमानी भी ना हो और किसी को हानि भी ना हो"।


