के०एम०जी०मन की बात भाग-16
आज मैं आपको जन्मदिन की कुछ गलतियों से अवगत कराऊँगा।
हमारे देश में जन्मदिन मनाने की परम्परा है । हमारे शास्त्रों की मान्यता है कि मानव जन्म अनेक पुण्यों के बाद मिलता है । हमारे यहाँ प्रार्थना की गई है कि हम कर्म करते हुए सौ वर्ष जीयें ।
संभवत: पहले यह परम्परा राजा महाराजाओं से प्रारम्भ हुई होगी और फिर जनता में आई । अब तो जन्मदिन मनाने का आम रिवाज है । नेताओं के जन्मदिन राष्ट्रीय स्तर पर मनाए जाते हैं और सामान्य व्यक्तियों के पारिवारिक स्तर पर ।
कल 18 जनवरी है और मेरा जन्मदिन भी । मैं 23 साल का हूँ और कल 24वीं साल में प्रवेश करुँगा। जन्मदिन मेरे लिए सबसे खुशी का दिन होता है। परिवार वाले सुबह-सुबह जन्म दिन की बधाई देते हैं।
आजकल जन्मदिन कौन मना रहा है सभी बर्थडे मना रहे हैं।प्राचीन वैदिक परम्परा में जन्मदिन के दिन नित्य कर्म के बाद देवपूजन, ग्रहपूजन करके दान देने की परम्परा है और बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है जबकि बर्थडे को बाजारी केक पर अपना नाम लिखवा कर स्वयं चाकू से काट देना, मोमबत्ती को फूंक मारकर बुझा देना,यह अंग्रेजों की परम्परा रही है।
आज एक रिवाज/फैशन/दिखावा बन गया हैं, जन्मदिन पंचांग तिथि से न मनाकर अवैज्ञानिक तारीख से मनाना ।
जन्मदिन ता विवाह वाले दिन केक काटकर मुंह के लगाना हिन्दू समाज में शुभ दिन में कुछ काटा नहीं जोड़ा जाता है ।
मोमबत्ती बंद कि जाती है जबकि हिन्दू धर्म में शुभ दिन में दीपक जलाए जाते है बंद नहीं किए जाते है ।
जन्म दिन पर दीपक बंद करने का अर्थ है कि मेरे अगले वर्ष में अंधेरा रहे
आज हमलोग जिस संस्कृति के लिए पुरे दुनिया में जाने जाते है यथा वसुधैव कुटुंबकम् ,सर्वे भवन्तु सुखिनः, तमसो माँ ज्योतिर्गमय, , अभिवादनशीलस्य - वृद्धोपसेविनः आयु आयुर्विद्यायशोबलम्, दीप से दीप जले
इत्यादि ऋषि वचन की वैज्ञानिकता को भूल गए है।
यही नहीं आज की युवा पीढ़ी whatappsके माध्यम से तमसो माँ ज्योतिर्गमय अर्थात "जीवन के समस्त अन्धकार को मिटाकर प्रकाश फैला दो माँ " के स्थान पर युवा पीढ़ी यह व्याख्या करती है " तू सो जा माँ मैं ज्योति ( girl friend ) के पास जा रहा हू" अब आप ही बताये हमारा भविष्य का समाज किस ओर जा रहा है।
आज हम सब पाश्चात्य संस्कृति को अपनाकर अपने आप में गर्व महशुश करते है परन्तु यह नहीं सोचते की होटल या माल में अपने दोस्तों के साथ जन्मदिन मनाने के लिए जरूरत से ज्यादा पैसे मांगने और न मिलने पर आत्महत्या जैसी घटना को, समाज के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है उसके जिम्मेदार कौन है ? वस्तुतः हम सब स्वयं ही है क्योकि कही न कही यह सब हमारे रहन सहन एवं तौर तरीके के प्रभाव के कारण ही ऐसा हो रहा है।
भारत में अंग्रेजों के आगमन के बाद भी परंपरागत तिथियों के अनुसार ही जन्मदिन मनाने की परंपरा थी|
परंतु अब बहुत से परिवारों में पाश्चात्य तिथियों के अनुसार ही जन्मदिवस मनाने का प्रचलन हो गया।
भारतीय संस्कृति का हर पहलू लोककल्याण से जुड़ा है।
वर्तमान समय में पूरा विश्व समुदाय हमारे वैदिक विज्ञान की श्रेष्ठता स्वीकार करने लगा है वही हम सब उनके शैली को अपनाकर गर्व महसूस करते हैं जन्मदिन पर केक काटना, मोमबत्तियाँ जलाकर बुझाना, जन्म दिन के जश्न में शराब मांस का भक्षण करना इत्यादि कार्यक्रम को हमारी भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं है। आज हम मोमबत्ती जलाते है पुनः उसे बुझाकर हैप्पी बर्थडे कहते है। भारतीय संस्कृति में प्रत्येक शुभ कार्य का प्रारम्भ दीप प्रज्ज्वलित कर करने का विधान है प्रज्वलित दीप को कभी भी बुझाया नहीं जाता है बल्कि अखण्ड जोत जलाया जाता है। प्रज्वलित दीप को बुझाना तो अशुभ माना गया है। बच्चे हमारे कुलदीप हैं, उनके यशकीर्ति तथा उज्ज्वल भविष्य की कामना दीपक जला कर करनी चाहिए, मोमबत्तियाँ बुझाकर नहीं।
यही कारण है कि मैं अपना जन्मदिन केक काटकर और मोमबत्ती भुझाकर नही मानता।
के०एम०जी०
रोहड़ू क्षेत्र से....
आज मैं आपको जन्मदिन की कुछ गलतियों से अवगत कराऊँगा।
हमारे देश में जन्मदिन मनाने की परम्परा है । हमारे शास्त्रों की मान्यता है कि मानव जन्म अनेक पुण्यों के बाद मिलता है । हमारे यहाँ प्रार्थना की गई है कि हम कर्म करते हुए सौ वर्ष जीयें ।
संभवत: पहले यह परम्परा राजा महाराजाओं से प्रारम्भ हुई होगी और फिर जनता में आई । अब तो जन्मदिन मनाने का आम रिवाज है । नेताओं के जन्मदिन राष्ट्रीय स्तर पर मनाए जाते हैं और सामान्य व्यक्तियों के पारिवारिक स्तर पर ।
कल 18 जनवरी है और मेरा जन्मदिन भी । मैं 23 साल का हूँ और कल 24वीं साल में प्रवेश करुँगा। जन्मदिन मेरे लिए सबसे खुशी का दिन होता है। परिवार वाले सुबह-सुबह जन्म दिन की बधाई देते हैं।
आजकल जन्मदिन कौन मना रहा है सभी बर्थडे मना रहे हैं।प्राचीन वैदिक परम्परा में जन्मदिन के दिन नित्य कर्म के बाद देवपूजन, ग्रहपूजन करके दान देने की परम्परा है और बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है जबकि बर्थडे को बाजारी केक पर अपना नाम लिखवा कर स्वयं चाकू से काट देना, मोमबत्ती को फूंक मारकर बुझा देना,यह अंग्रेजों की परम्परा रही है।
आज एक रिवाज/फैशन/दिखावा बन गया हैं, जन्मदिन पंचांग तिथि से न मनाकर अवैज्ञानिक तारीख से मनाना ।
जन्मदिन ता विवाह वाले दिन केक काटकर मुंह के लगाना हिन्दू समाज में शुभ दिन में कुछ काटा नहीं जोड़ा जाता है ।
मोमबत्ती बंद कि जाती है जबकि हिन्दू धर्म में शुभ दिन में दीपक जलाए जाते है बंद नहीं किए जाते है ।
जन्म दिन पर दीपक बंद करने का अर्थ है कि मेरे अगले वर्ष में अंधेरा रहे
आज हमलोग जिस संस्कृति के लिए पुरे दुनिया में जाने जाते है यथा वसुधैव कुटुंबकम् ,सर्वे भवन्तु सुखिनः, तमसो माँ ज्योतिर्गमय, , अभिवादनशीलस्य - वृद्धोपसेविनः आयु आयुर्विद्यायशोबलम्, दीप से दीप जले
इत्यादि ऋषि वचन की वैज्ञानिकता को भूल गए है।
यही नहीं आज की युवा पीढ़ी whatappsके माध्यम से तमसो माँ ज्योतिर्गमय अर्थात "जीवन के समस्त अन्धकार को मिटाकर प्रकाश फैला दो माँ " के स्थान पर युवा पीढ़ी यह व्याख्या करती है " तू सो जा माँ मैं ज्योति ( girl friend ) के पास जा रहा हू" अब आप ही बताये हमारा भविष्य का समाज किस ओर जा रहा है।
आज हम सब पाश्चात्य संस्कृति को अपनाकर अपने आप में गर्व महशुश करते है परन्तु यह नहीं सोचते की होटल या माल में अपने दोस्तों के साथ जन्मदिन मनाने के लिए जरूरत से ज्यादा पैसे मांगने और न मिलने पर आत्महत्या जैसी घटना को, समाज के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है उसके जिम्मेदार कौन है ? वस्तुतः हम सब स्वयं ही है क्योकि कही न कही यह सब हमारे रहन सहन एवं तौर तरीके के प्रभाव के कारण ही ऐसा हो रहा है।
भारत में अंग्रेजों के आगमन के बाद भी परंपरागत तिथियों के अनुसार ही जन्मदिन मनाने की परंपरा थी|
परंतु अब बहुत से परिवारों में पाश्चात्य तिथियों के अनुसार ही जन्मदिवस मनाने का प्रचलन हो गया।
भारतीय संस्कृति का हर पहलू लोककल्याण से जुड़ा है।
वर्तमान समय में पूरा विश्व समुदाय हमारे वैदिक विज्ञान की श्रेष्ठता स्वीकार करने लगा है वही हम सब उनके शैली को अपनाकर गर्व महसूस करते हैं जन्मदिन पर केक काटना, मोमबत्तियाँ जलाकर बुझाना, जन्म दिन के जश्न में शराब मांस का भक्षण करना इत्यादि कार्यक्रम को हमारी भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं है। आज हम मोमबत्ती जलाते है पुनः उसे बुझाकर हैप्पी बर्थडे कहते है। भारतीय संस्कृति में प्रत्येक शुभ कार्य का प्रारम्भ दीप प्रज्ज्वलित कर करने का विधान है प्रज्वलित दीप को कभी भी बुझाया नहीं जाता है बल्कि अखण्ड जोत जलाया जाता है। प्रज्वलित दीप को बुझाना तो अशुभ माना गया है। बच्चे हमारे कुलदीप हैं, उनके यशकीर्ति तथा उज्ज्वल भविष्य की कामना दीपक जला कर करनी चाहिए, मोमबत्तियाँ बुझाकर नहीं।
यही कारण है कि मैं अपना जन्मदिन केक काटकर और मोमबत्ती भुझाकर नही मानता।
के०एम०जी०
रोहड़ू क्षेत्र से....

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